मुस्कान जो पूरी कॉलोनी घूम आई

क्या आपने कभी सोचा है — जो मुस्कान हम किसी को देते हैं, वह उसके बाद कहाँ जाती है?

खुशी ने ठीक यही सोचा, एक सोमवार की सुबह, चंदन कॉलोनी के दूध-बूथ पर। वह लाइन में सातवें नंबर पर खड़ी थी, हाथ में स्टील का डिब्बा लिए, जब उसने देखा कि आगे खड़े अंकल अपनी जेबें टटोल रहे हैं। एक बार। दो बार। तीन बार। हर बार उनका चेहरा और उतर जाता।

“बटुआ तो घर ही रह गया,” उन्होंने दूधवाले से धीरे-से कहा। “मुझे वापस आना पड़ेगा।”

खुशी ने अपनी हथेली के दो-दो रुपये के सिक्कों को देखा — उसके आइस-लॉली के पैसे, पूरे हफ़्ते से जमा किए हुए। यही तो वह पल था। वह चुप रह सकती थी और सिक्के मुट्ठी में गरम रख सकती थी। या फिर वही कर सकती थी जिससे उसका दिल साइकिल की घंटी-सा टिंग बजता था।

“अंकल,” उसने सिक्के आगे बढ़ाते हुए कहा, “आप कल लौटा दीजिएगा। दूध का इंतज़ार नहीं होता। छोटे बच्चे चिड़चिड़े हो जाते हैं।”

अंकल हँस पड़े — एक हैरान, सुबह-सी ताज़ा हँसी — और दो बार शुक्रिया कहा। और खुशी को लगा, बात यहीं खत्म।

पर बात यहीं खत्म नहीं हुई।

क्योंकि पास की बाउंड्री वॉल पर, टाँगें झुलाते और हमेशा की तरह हर चीज़ पर नज़र रखते हुए बैठा था अनीश — खुशी का बड़ा भाई, दो साल बड़ा और सौ शब्द ज़्यादा चुप। अनीश ज़्यादा बोलता नहीं। पर उसने अपनी छोटी बहन को अपने लॉली के पैसे देते चुपचाप देखा था — और अब देखा कि दूध-बूथ वाले अंकल मुस्कुराते हुए लौटे, और फिर — अनीश दीवार से गिरते-गिरते बचा — अंकल ने शर्मा आंटी के भारी सब्ज़ी के थैले सीढ़ियों तक पहुँचाने में मदद की।

दिलचस्प, अनीश ने सोचा, और वह मुस्कान के पीछे ऐसे चल पड़ा जैसे जासूस किसी सुराग़ के पीछे।

शर्मा आंटी ने, अब हाथ खाली होते ही, अख़बार वाले लड़के को “रास्ते के लिए” दो अमरूद दे दिए। लड़का मज़े से अमरूद खाते हुए गुलमोहर के नीचे रोती चौकीदार की नन्ही बेटी को देख बैठा — पतंग डाल में फँसी थी — और लंबी छड़ी लेकर वापस साइकिल दौड़ा आया। पतंग हाथ में लेकर वह बच्ची हँसती हुई भागी…

…पार्क की ओर, जहाँ चार बजते-बजते बाकी गुडनेस गैंग जमा हो चुका था।

आरव, बारह साल का सबसे बड़ा, अपनी wonder-notebook खोले आँगन का स्केच बना रहा था — वैसे ही जैसे वह हर चीज़ का बनाता है। तारा, नौ साल की और सवालों से भरी, घुटनों के बल अपनी मैग्नीफाइंग ग्लास से बड़ी गंभीरता से कबूतर गिन रही थी। और खुशी झूले पर बैठी थी, थोड़ी उदास — उसने आइस-लॉली की गाड़ी को बिना रुके निकलते देखा था। न सिक्के, न लॉली। दयालु होना, वह सीख रही थी, कभी-कभी दोपहर में एक कीमत माँगता है।

तभी चौकीदार की बेटी उछलती हुई आई और खुशी के हाथ में कुछ रख दिया। एक संतरी आइस-लॉली, ऊपर से खुली हुई।

“पापा ने दो खरीदी थीं,” बच्ची खिलखिलाई। “आपको दूसरी की ज़रूरत लग रही थी। और देखो — मेरी पतंग वापस आ गई!”

खुशी ने लॉली को देखा, फिर आसमान को, फिर अनीश को — जो अभी-अभी पहुँचा था, दिन भर मुस्कानों के पीछे भागते-भागते हाँफता हुआ।

अनीश पूरी सुबह एक पूरा वाक्य बोले बिना निकाल सकता था। पर एक कड़ी भी तो एक तरह की पहेली थी, और पहेलियाँ उसे खोल देती थीं। “तुम यक़ीन नहीं करोगी, तुम्हारी मुस्कान कहाँ-कहाँ घूम आई,” उसने कहा — और उसने पूरे गैंग को सफ़र सुनाया, बूथ से सीढ़ियों तक, अमरूद से पतंग तक, पतंग से लॉली तक, हर पड़ाव उँगलियों पर गिनते हुए, जैसे रेलगाड़ी के स्टेशन।

“ज़रा दूसरी तरफ़ से देखो,” आरव ने धीरे-से कहा। “तुमने दो रुपये गँवाए नहीं, खुशी। तुमने उन्हें बोया है।”

“अच्छा, एक सवाल और—” तारा एकदम उठ खड़ी हुई, मैग्नीफाइंग ग्लास भूलकर। “अगर यह घूमकर खुशी तक वापस आ गई… तो अब यह जा कहाँ रही है?”

और एक नई आवाज़, पुराने पीतल-सी गरम, नीम के पेड़ के पास से बोली: “वही, नन्ही जासूस, सबसे अच्छा सवाल है।” पहले एक जोड़ी संतरी sneakers दिखे — फिर बाकी का जिन्न, मुस्कुराता हुआ। “wish आसान है,” उसने कहा। “choice ही असली जादू है।”

खुशी ने धीरे-धीरे लॉली चाटी। “तो मैंने दो रुपये दिए,” उसने कहा, “और कॉलोनी ने बदले में मुझे एक पूरी adventure दे दी।”

“अच्छे चुनाव करने की सुपरपावर,” अनीश ने कंधे उचकाते हुए धीरे-से कहा। “यह तब भी काम करती है जब कोई देख नहीं रहा होता।”

चंदन कॉलोनी में कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ के बच्चे एक चुपचाप-सी सुपरपावर रखते हैं — दिखती नहीं, पर उसका किया हुआ हमेशा दिखता है। ये खुद को गुडनेस गैंग कहते हैं, और जो भी रोज़ अच्छे चुनाव करने की पूरी कोशिश करता है, वह पहले से ही इसका सदस्य है: एक Kindness Champion। शायद आप भी एक हैं — और आपको पता ही न हो।

कहानी की सीख: दी हुई कोई भी दयालुता कभी खोती नहीं — वह बस सफ़र पर निकल जाती है।

अब हम सोच रहे हैं, साथी voyager:

  • आपको क्या लगता है, लॉली के बाद खुशी की मुस्कान कहाँ गई होगी? कहानी वहाँ खत्म नहीं होती जहाँ पन्ना खत्म होता है।
  • क्या कभी कोई दयालुता किसी बिलकुल अनजान दिशा से लौटकर आपके पास आई है?

“Guided by Goodness, the world shines bright!”

जहाँ नेकी, वहाँ रोशनी!

— Virtue Voyager

बड़ों के लिए नोट

बड़ों के लिए, जो बच्चे के साथ हैं: आपने कब किसी को दी हुई दयालुता को किसी अनजान रूप में वापस पाया — शायद बरसों बाद, शायद पहचान से परे बदली हुई? आज रात अपने बच्चे को वह सच्ची कहानी सुनाइए; बच्चों को सच्ची कहानियाँ सबसे लंबे समय तक याद रहती हैं।

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