फ्रेंडशिप डे का वादा

एक वादा असल में बनता किस चीज़ से है? काग़ज़ से नहीं। शायद शब्दों से भी नहीं। खुशी को आज यही पता चलने वाला था।

फ्रेंडशिप डे था, और आँगन रंगों से भरा था — कलाइयों पर बैंड, हाथों से बदलते कार्ड, और खुशी हमेशा की तरह पूरी रफ़्तार से बोलती हुई। तारा उसे नीम के पेड़ के पास मिली, हाथ में मिट्टी का एक छोटा गमला थामे, जिसमें एक अकेला, बड़ा संजीदा-सा मनी-प्लांट था।

“शनिवार को measuring day है,” तारा ने ऐलान किया। पूरे तीन हफ़्ते से वह अपना experiment चला रही थी — क्या पौधा तेज़ी से बढ़ता है अगर उसे पढ़कर सुनाया जाए? — और शनिवार को बड़ा फ़ैसला था: पत्तियाँ नापो, chart देखो, सच जानो। “तुमने वादा किया था कि आओगी। तुम पौधे की official cheer-friend हो।”

“पक्का-पक्का वादा,” खुशी ने अपनी छोटी उँगली तारा की उँगली में फँसाते हुए कहा। “शनिवार। दस बजे। मैं ruler भी लाऊँगी और snacks भी।”

और उसका मतलब भी यही था — हर एक शब्द से।

फिर शुक्रवार आया।

शुक्रवार खुशी की बड़ी कज़िन रिया की शक्ल में आया, जो एक ऐसी ख़बर लेकर आई कि खुशी का दिल उछल पड़ा: “कल हम Aqua Splash जा रहे हैं — वो बड़ा वाला water park, पीली स्लाइड वाला। तुम्हारी मम्मी ने कहा तुम भी आ सकती हो। हम नौ बजे निकलेंगे।”

नौ बजे। शनिवार। पीली स्लाइड।

खुशी का मुँह “हाँ!” चिल्लाने को खुला — और फिर बंद हो गया। उसकी पसलियों के नीचे कहीं, एक छोटा मिट्टी का गमला इंतज़ार कर रहा था। एक छोटी उँगली, फँसी हुई।

“तारा से कह देना अगले हफ़्ते पौधा नाप लेंगे,” रिया ने बड़ी आसानी से कहा। “अरे, पौधा ही तो है। रुक जाएगा।”

और यह सच था। पौधा रुक जाता। नापना किसी भी दिन हो सकता था। बहाना ठीक सामने था — आसान और चमकीला, बिलकुल एक water slide के नाप का।

खुशी उस रात दो शनिवारों के बीच खिंचती हुई सोने गई, जैसे दो बेसब्र पिल्ले दोनों तरफ़ से खींच रहे हों।

सुबह उसने एक छोटा, कठिन, मामूली-सा काम किया। उसने रिया को फ़ोन किया। “बहुत-बहुत शुक्रिया,” उसने अपनी सबसे विनम्र आवाज़ में कहा, “पर मैं नहीं आ पाऊँगी। मुझे एक पौधे के लिए cheer करना है।”

रिया को लगा खुशी का दिमाग़ थोड़ा घूम गया है। रास्ते भर खुशी को भी थोड़ा-थोड़ा ऐसा ही लगा — तारा की बालकनी तक।

पर वहाँ उसने जो पाया, वह देखिए।

तारा ने दो गिलास नींबू-पानी रख छोड़े थे। दो। उसने एक नन्हा काग़ज़ का झंडा बनाया था जिस पर लिखा था — MEASURING DAY। और जब खुशी अंदर आई, तो तारा का पूरा चेहरा कुछ उलझा-सा और चमकीला हो उठा — ज़्यादातर, राहत।

“मुझे यक़ीन नहीं था कि तुम आओगी,” तारा ने बहुत धीरे से माना, मैग्नीफाइंग ग्लास हाथ में यूँ ही भूली हुई। “लोग शनिवार कहते हैं, और फिर… नहीं आते।”

और खुशी एकदम समझ गई कि एक वादा असल में बनता किस चीज़ से है। काग़ज़ से नहीं। शब्दों से भी नहीं। यह बनता है — पहुँच जाने से — ख़ासकर उन सुबहों में जब एक पीली स्लाइड आपका नाम पुकार रही हो।

(वैसे, उन्होंने पौधा नापा भी। जिन पत्तियों को पढ़कर सुनाया गया था, वे बिलकुल, हूबहू उतनी ही थीं जितनी बिना सुनाई गई पत्तियाँ। experiment एक शानदार नाकामी था। वे इतना हँसीं कि नींबू-पानी लगभग तारा की नाक से निकल पड़ा। वह महीने का सबसे अच्छा शनिवार था।)

अब हम सोच रहे हैं, साथी voyager:

  • कौन-सा वादा निभाना ज़्यादा मुश्किल है — वह जिसे तोड़ने पर कोई कुछ न कहे, या वह जिसे सब देख रहे हों?
  • क्या कभी कोई आपके लिए “पहुँच गया” जब वह आसानी से पीली स्लाइड चुन सकता था?

बड़ों के लिए नोट

बड़ों के लिए, जो बच्चे के साथ हैं: कोई छोटा वादा याद कीजिए जो आपने किसी बच्चे से तब भी निभाया जब वह असुविधाजनक था — और सोचिए उसने चुपचाप क्या बनाया। बच्चे भव्य वादे नहीं, बल्कि यह याद रखते हैं कि कौन पहुँचा

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