एक और एक मिलकर ग्यारह — भाग 2
दो दीवारों वाली उस शाम, एक जंग छिड़ी। शुरुआत, जैसे ऐसी जंगें होती हैं, ओरिगामी काग़ज़ से हुई। खुशी ने अनीश के अच्छे सुनहरे काग़ज़ की तीन शीट बिना पूछे ले ली थीं (“मुझे सुनहरा चाहिए था, चाँद के लिए है”), और बदले में अनीश ने बिना पूछे उसकी पूरी शेल्फ़ फिर से करीने से…
